Thursday, 30 March 2017

पथरी और गुर्दे (किडनी) रोगों के लिए रामबाण है खीरा- योगाचार्य विजय

 " योग की दृष्टि से कपालभाति करता है किडनी को पुष्ट"  

 गर्मियों के प्रारम्भ में प्रकृत्ति प्रदत्त औषधीय गुणों से भरपूर सलाद के रूप में प्रयोग किया जाने वाला सब्जी परिवार का प्रमुख सदस्य खीरा प्रचुर मात्रा में बाजार में दिखाई देने लगता है| आम तौर पर इसे उत्तर प्रदेश में खीरा, के नाम से ही जाना जाता है, कहीं कहीं इसे ककड़ी नाम से भी संबोधित किया जाता है. संस्कृत में इसे वृहल्फला तथा मूत्रफला, मराठी में वालुक, गुजराती में काकड़ी, बंगला में काकुर, अंग्रेजी में  क्यूकम्बर तथा बोटॉनिकल दृष्टि से क्यूक्युमिस युटिलीस्सीमस के नाम से जाना जाता है.
    सलाद के तौर पर प्रयोग किये जाने वाले खीरे में इरेप्सिन नामक एंजाइम होता है जो प्रोटीन को पचाने में सहायक होता है. खीरे में विटामिन ए. , बी. , बी.6 , सी. , डी. , पोटैशियम, फास्फोरस, आयरन आदि प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. खीरा पानी का बहुत अच्छा स्रोत है, इसमें 96 % पानी होता है. खीरा कब्ज से मुक्ति दिलाने के साथ-साथ पेट से जुडी हर समस्या के लिए फायदेमंद साबित होता है. एसिडिटी, छाती के जलन में खीरे का नियमित सेवन लाभप्रद होता है.  खीरी में मौजूद सिलिकन और सल्फर बालों के ग्रोथ में मदद करते हैं. खीरा त्वचा को सनबर्न  से भी बचाता है. खीरे में साइकोइसोलएरीक्रिस्त्रोल,  लैरीक्रिस्त्रोल, पाइनोरीस्त्रोल आदि तत्त्व पाए जाते हैं जो सभी प्रकार के कैंसर जिसमें स्तन कैंसर भी शामिल है के रोकथाम में कारगर है.  खीरा गुर्दे को स्वस्थ्य रखने के साथ-साथ गुर्दे की पथरी को समाप्त करने के लिए रामबाण औषधि है. खीरे के नियमित सेवन से मासिक धर्म में होने वाली परेशानियों से छुटकारा मिलता है. खीरे के सेवन से ह्रदय संबंधी रोगों की भी आशंका कम हो जाती है. खीरा में फाइबर व मैग्नीशियम होता है जो है ब्लड प्रेशर में एक तरह से दवा का काम करता हैं.  खीरे के एक टुकड़े को जीभ से मुंह के ऊपरी हिस्से पर एक मिनट तक रोकें, ऐसे में खीरे से निकलने वाला फाइटोकेमिकल मुंह की दुर्गन्ध को खत्म करता हैं. खीरे में सीलिशिया प्रचुर मात्रा में होता है जो जोड़ों को मजबूत करता है.

Wednesday, 29 May 2013

पौष्टिक तत्वों का भण्डार लीची - योगाचार्य विजय कुमार श्रीवास्तव

लीची का फल
   घनी हरी पत्तियों के बीच गहरे लाल रंग के बड़े बड़े गुच्छों में लटके लीची के फल देखते ही बनते हैं । सुन्दर व स्वादिष्ट फल लीची का अगर मूल देश देखा जाये तो वह है चीन । लेकिन येन केन प्रकारेण भारत इसकी खेती सन 1890 में सर्वप्रथम देहरादून में प्रारंभ हुई। १९७० में देहरादून के ६५०० हेक्टेयर भूमि पर इस स्वादिष्ट फल की खेती होती थी लेकिन वर्तमान में अब लीची की खेती देहरादून के ३०७० हेक्टेयर भूमि पर ही हो रही है , यह सोदबेरी परिवार का श्वेत दुधिया गुदे वाला विटामिन सी से युक्त फल है जिससे हड्डियाँ मजबूत रहती हैं । इसमें जल की प्रचुरता होती है जिससे की गरमी में खाने से शरीर में पानी के अनुपात को संतुलित रखते हुए ठंडक पहुचता है । उत्तम स्वास्थ्य की दृष्टि से देखा जाये तो लीची में पोटेशियम व नैसर्डिक शक्कर की भरमार है । दस लीचियों से हमें लगभग ६५ कैलोरी मिलती है । ज्यादा समय न टिक पाने के कारण इसे एक बार पकने के बाद जल्द ही खा लेना चाहिए । इसके गुदे के अन्दर गहरे भूरे रंग का एक बड़ा बीज होता है जो खाने के काम नहीं आता । लीची को फल के रूप में शरबत, फ्रूट सलाद और आइसक्रीम के रूप में खाने का प्रचलन लगभग पुरे संसार में  है । लीची घनिष्ट पारिवारिक समंधों की प्रतिक समझी जाती है ।

Wednesday, 16 January 2013

डेंगू से सुरक्षा - योग व हर्बल में है विद्यमान - (योगाचार्य विजय श्रीवास्तव)

डेंगू 
योगाचार्य विजय श्रीवास्तव 











 एक तरफ वर्तमान में चारों ओर फैलता जा रहा है डेंगू का आतंक । डेंगू से होने वाली मौतों से लोग डरते जा रहे हैं। गन्दगी के साम्राज्य से, गंदे पानी के इकट्ठे होने पर भी बढ़ रहे है डेंगू फैलाने वाले मच्छर । सरकारी स्वस्थ्य महकमा डेंगू फैलने के बाद दवा का छिडकाव व स्वछता पर ध्यान देते हैं। निजी अस्पतालों में एन. एस.- १ टेस्ट तथा सरकारी अस्पतालों में एलिसा टेस्ट कराया जारहा है इसके लिए स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा मान्यता भी दी गयी है । डेंगू का सबसे बड़ा दुष्परिणाम है की पीड़ित के शरीर से प्लेटलेट्स की मात्रा निरंतर घटती चली जाती है, जिससे शरीर के अन्दर रक्त प्रवाह होने लगता है ऐसी स्थिति में मरीज़ की मौत हो सकती है । डेंगू वायरस के संक्रमण से होता है। इसके इलाज के लिए एलोपैथ में कोई विशेष एंटीबायोटिक दवा उपलब्ध नही है, एलोपैथिक चिकित्सा में इसका सफल इलाज है प्लेटलेट्स चढ़ाना, जो प्रत्येक अस्पतालों में संभव नही है और महँगा भी है तथा साथ चिकित्सक कुछ प्रज्ज्वलन रोधी दवाएं भी देते है । किन्तु ऐसी स्थिति में एलोपैथिक चिकित्सा के साथ साथ योग के अंतर्गत आने वाला महत्वपूर्ण प्राणायाम " नाड़ी शोधन प्राणायाम " तथा हर्बल की दृष्टि से पपीते के पत्ते का रस अति उपयोगी सिद्ध होगा व चमत्कारी प्रभाव दिखायेगा । डेंगू का प्रभाव ही न हो इसके लिए सतर्कता की दृष्टि से एक सप्ताह ताजा गिलोय का एक इंच टुकड़ा प्रतिदिन प्रातः लेना व नियमित अनुलोम विलोम प्राणायाम, भ्रस्त्रिका प्राणायाम तथा घरेलू औषधीय मसालों पर आधारित हर्बल चाय या काढ़ा जिसमें काली मिर्च, तेज पत्ता, दालचीनी, लवंग, सोंठ, अजवायन जैसे रोग प्रतिरोधी गुणों से युक्त सामग्रियों के समावेशों का सेवन अति उपयोगी है । लाक्षणिक दृष्टि से अकस्मात् तेज बुखार, रक्तचाप की कमी, पसीना युक्त बुखार, आँखों में लालिमा, दिल धड़कने की गति का कम हो जाना, आँखों में जलन, पीठ के नीचले भाग यानी कमर में दर्द, मांसपेशियों में खिंचाव, आँखों के उपरी भाग पर दर्द, ठण्ड लगना, बेचैनी तथा सिर में दर्द ये सब डेंगू के संभावित संकेत हैं, जिसके लिए उपरोक्त योग व हर्बल नुस्खे अवश्य लाभकारी सिद्ध हो सकते है।
हर्बल चिकित्सा की दृष्टि से गुरूच (गिलोय), तुलसी, गुड़, भूमि आंवला, कुटकी और कालमेघ के समभाग मिश्रण का काढ़ा डेंगू से बचाव के लिए एक विश्वसनीय नुस्खा है। विजयसार की छाल व प्याज का काढ़ा भी निश्चित ही उपयोगी सिद्ध होगा।

शीत ऋतु में अत्यधिक प्रभावशाली है होम मेड हर्बल टी व अजवायन का सेवन - योगाचार्य विजय श्रीवास्तव




   ♦  शीत ऋतु में,





ठण्ड से बचने के लिए लोग तरह तरह की युक्ति व जुगाड़ में लगे रहते हैं, रूम हीटर, ब्लोअर, अलाव, कउड़ा, शरीर पर कई कपडे भी लाद लेंगे यहाँ तक कि कुछ लोग घरों से निकलना भी बंद कर देते हैं।

 चाय पर चाय भी पी जाते हैं जो कि  नुकसान देय है क्योंकि चायपत्ती  के माध्यम से शरीर में अत्यधिक निकोटिन जाना स्वास्थ्य  के लिए हानिकारक है।



किन्तु यदि हम कुछ घरेलू मसालों के माध्यम से घर पर हर्बल पेय बनाकर केवल दिन में दो बार सेवन कर लें, एकाक बार थोड़ी सी अजवायन फांक लें तथा योगासन की दृष्टि से सूर्य नमस्कार व् योग मुद्रासन तथा प्राणायाम की दृष्टि से भ्रस्त्रिका व सूर्यभेदी  प्राणायाम शरीर को अतिरिक्त उर्जा व ऊष्मा देता है ।
           
      हर्बल पेय के लिए निम्नांकित सभी सामान जैसे काली मिर्च, छोटी इलायची, तेजपत्ता, लवंग, दालचीनी, मुलेठी, अजवायन, सोंठ, पीपर, स्याह जीरा इत्यादि को सम मात्रा में लेकर पाउडर बना कर एक में मिला लें।



  अनुपात की दृष्टि से दो कप पानी में उक्त मिश्रण का पाउडर १/२ चम्मच, एक चम्मच शक्कर, चार तुलसी पत्ती, आवश्यकतानुसार दूध डाल कर खौला लें। चायपत्ती डालने की आवश्यकता नहीं है, अब इसे छान कर चुस्की लेते
        हुए शरीर को स्वस्थ रखें।
    यहाँ यह बताना आवश्यक है कि इस पेय पदार्थ व अजवायन के अलग सेवन से शरीर को ऊष्मा व उर्जा तो मिलेगी ही साथ ही साथ शीत ऋतु में होने वाली समस्याएँ जैसे सर्दी, खांसी, गले की खराश, टांसिल रोग, काफ, सीने की जकड़न, बुखार, उल्टी , कोल्ड डायरिया इत्यादि से मुक्ति मिलेगी।
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योग की विभिन्न मुद्राएँ : योगाचार्य विजय श्रीवास्तव

♦ उत्तम स्वास्थय के लिए योग
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♦ योग द्वारा रोग निवारण
♦ योग से जटिल से जटिल बीमारियों का इलाज संभव

 ♦ योग की विभिन्न मुद्राओं में योग व हर्बल विशेषज्ञ विजय श्रीवास्तव

ध्यान मुद्रा में योगाचार्य विजय श्रीवास्तव
Yogacharya Vijay Shriwastava in the posture of meditation



शीर्षासन की मुद्रा में योगाचार्य विजय श्रीवास्तव