Tuesday, 18 September 2012

♦ गुडहल का फूल और अनुलोम विलोम प्राणायाम दोनों ही हैं उत्तम रक्त शोधक ♦


शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा जो गुड़हल के फूल को जानता पहचानता नहीं होगा | हाँ यह जरुर है कि अलग अलग भाषाओँ व क्षेत्र में यह अलग - अलग नामों से जाना जाता है | हिंदी में इसे गुड़हल और ओडहुल नामों से जाना जाता है, बंगला में जवा, संस्कृत में जपाती संध्या, गुजराती में जासुद, मराठी में जास्वंद व अंग्रेजी में हिस्विस्कस नाम से जाना जाता है | यह पुष्प आदि शक्ति माँ दुर्गा को अति प्रिय है इसीलिए बहुत से लोग इसे देवी फूल भी कहते हैं | यह फूल जितना देखने में सुन्दर होता है उससे कई गुना ज्यादा इसमें औषधीय गुण भी विद्यमान है | जिस तरह योग शास्त्र में रक्तशोधक के रूप में अनुलोम विलोम प्राणायाम को महत्वपूर्ण बताया गया है उसी प्रकार फूलों में गुड़हल के फूल को उत्तम रक्तशोधक माना गया है | गुड़हल के फूल का पेस्ट बनाकर बालों में लगाने से बाल रेशम की तरह मुलायम व चमकदार होते हैं साथ ही गंजापन दूर होता है  | गुण धर्म की दृष्टि से यह मधुर, कफ - पित्त शामक, रक्तशोधक , पुष्टिकारक, मूत्रल तथा रक्तार्श, रक्तातिसार, स्मरण शक्ति की दौर्बल्यता, बुखार, ह्रदय रोग, दाद, प्रमेह, प्रदर, उन्माद, आदि में लाभप्रद है |
गुड़हल की कली का नित्य प्रातः सेवन जोड़ों के विकारों हेतु श्रेयष्कर है, इसके सेवन से जोड़ों को गतिशील रखने वाले फ्यूल का उत्पादन व्यवस्थित रहता है किन्तु याद रहे कली का हरा हिस्सा सेवन नही करना है | गुड़हल का फूल चबाने से मुंह के छाले ठीक हो जाते हैं | उन्माद रोग  दूर करने वाला यह एकमात्र पुष्प है, पेट की गर्मी से होने वाले रोगों में गुड़हल का गुलकंद या शरबत काफी हितकारी तो होता ही है साथ ही गुड़हल के पुष्प का शरबत ह्रदय को पुष्प की भाँति प्रफुल्लित करने वाला होता है | गुड़हल का पुष्प रक्तशोधक, रक्त वर्धक, मन मस्तिष्क को शीतलता प्रदान करने वाला तथा प्रबल शक्ति वर्धक होता है |

Tuesday, 11 September 2012

मोटापा कम करने में सहायक "सूर्य नमस्कार" आसन व अश्वगंधा की पत्ती - योगाचार्य विजय श्रीवास्तव


वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो आज हर व्यक्ति चाहता है कि उसकी काया पर चर्बी न हो यानि मोटापा न रहे | सच पूछा जाये तो मोटापा तो रोग की श्रेणी में आता है | इसलिए इस मोटापे से बचने के लिए कोई डायटिंग तो कोई डांस तो कोई तैराकी तो कोई मॉर्निंग वाक तो कोई जॉगिंग तो कोई रस्सी कूदता है, लेकिन योग व हर्बल के द्वारा मोटापा पूरी तरह से नियंत्रित हो जाता है | योग के अंतर्गत आने वाले सूर्य नमस्कार आसन के द्वारा तथा अश्वगंधा के नियमित चार पत्ती के सेवन से निश्चित ही मोटापे से मुक्ति मिलती है | नित्य लौकी का जूस भी सेवन करने से बढ़ती हुई चर्बी को रोका जा सकता है | यदि मोटापा से ग्रसित व्यक्ति यदि वर्ष में दो बार चंद्रायण व्रत कर ले तो निश्चित तौर पर बीस किलो वजन घट जाता है | उपरोक्त के अलावा नित्य यौगिक क्रियाओं के अलावा कुछ बिन्दुओं पर भी व्यक्ति अगर ध्यान दे तो सोने पे सोहागा की तरह काम करेगा जैसे रोज कम से कम तीन से चार लीटर पानी पीना, नित्य कम से कम एक से दो किलो मीटर पैदल चलना, ऐसा खाद्य पदार्थ लेना जिसमें 'वसा' कम हो तथा फाइबर की मात्रा अधिक हो, घर के इर्द गिर्द, मुहल्लों इत्यादि पास-पड़ोस में जाने के लिए पैदल ही जाएँ | आहार संतुलित हो | जूस इत्यादि ऐसे लिक्विड पदार्थों का सेवन करें जिसमें कैलोरी व शुगर न के बराबर हो | दिन भर में खाद्य पदार्थों के माध्यम से जितनी कैलोरी शरीर में जा रही है कोशिश करके शारीरिक श्रम के माध्यम उस कैलोरी को अनिवार्य रूप से बर्न करना चाहिए | कोशिश यह भी करनी चाहिए कि घर पर छत इत्यादि पर जाने के लिए बनी सीढ़ी पर दिन में कई बार नियमित रूप स चढ़ें उतरे | योग-व्यायाम व हर्बल तथा उपरोक्त को जीवन चर्या में सम्मिलित कर लें तो निश्चित ही मोटापा नामक रोग से छुटकारा पा सकते हैं |



Saturday, 1 September 2012

" एक अनार सौ बीमार "


बहुत पुरानी कहावत है " एक अनार सौ बीमार " | इस कहावत का लोग तरह तरह का अर्थ लगाकर इसे बदनाम करते हैं, कहते हैं कि एक अनार के पेड़ से सौ बीमार होते हैं | लेकिन मेरे हिसाब से अनार वह महाऔषधि है जिसके एक पेड़ से सैकड़ो बीमारियों का इलाज होता है | अनार वह फल है जो पूरे संसार में पाया जाता है | भारत के विभिन्न भाषा क्षेत्र के हिसाब से भिन्न नामों से जाना  जाता है जैसे हिंदी में अनार, मराठी में डालिम्ब, बंगला में दाड़िम व दाड़िमी, संस्कृत में दाडिम, दंतबीजक, तेलगु में दानिम्भ पंडू, गुजराती में दाड्यम, दाडम, अंग्रेजी में पोमेग्रेनेट तथा लैटिन भाषा में प्युनिका ग्रेनेटम इत्यादि नामों से उच्चारित किया जाता है |


                                                           
गुण धर्म कि दृष्टि से यदि देखा जाये तो मीठा अनार तृप्तिकारक, त्रिदोष नाशक, हल्का किंचित कसैला, शुक्रजनक, मलावरोधक, स्निग्ध, बलवर्धक, स्मरण शक्ति वर्धक होता है | साथ ही दाह, तृषा, ज्वर, मुख दुर्गन्ध, हृदयरोग, मुख रोग व कंठ रोग  नाशक है | पित्तशामक, कृमिनाशक पेट रोगों के लिए हितकारी, घबराहट दूर करने वाला अनार स्वर तंत्र, फेफड़े, यकृत,  दिल, आमाशय तथा आँतरोगों के लिए विशेष हितकर है | अनार में एंटीवायरल, एंटीआक्सीडेंट, एंटीट्यूमर इत्यादि जैसे तत्त्व पाए जाते हैं | अनार विटामिन  का एक अच्छा स्रोत है जिसमें विटामिन ए, सी तथा ई की प्रचुरता होती है | पेट की गड़बड़ी और मधुमेह जैसे रोगों में अनार काफी फायदेमंद है | अनार का छिलका, पेड़ की छाल, पत्तियां और अनार के फूल के  सेवन से पेटदर्द में राहत मिलती है | पाचन तंत्र की सभी समस्याओं के निदान में अनार कारगर तो है ही साथ ही अनार की पत्तियों की चाय बनाकर पीने से पाचन सम्बन्धी समस्याओं में आराम मिलता है | दस्त और कालरा जैसी बीमारियों में अनार का जूस पीने से राहत मिलती है | मधुमेह के रोगियों को अनार खाने की सलाह दी जाती है | इससे कारोनरी रोगों का खतरा कम होता है | अनार में आयरन की प्रचुरता होती है, अनार का सेवन व योग के अंतर्गत आने वाले अनुलोम विलोम प्राणायाम तथा कपालभाति की क्रिया रक्त की कमी को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है | सूखे अनार के छिलकों का चूर्ण दिन में ३-४ बार एक - एक चम्मच ताजा पानी के साथ लेने से बार बार पेशाब आने की समस्या ठीक हो जाती है, अनार के छिलकों को पानी में उबाल कर उससे कुल्ला करने से श्वास की बदबू समाप्त हो जाती है, अनार के छिलकों का चूर्ण सुबह शाम आधा आधा चम्मच सेवन करने से बवासीर में भी लाभ मिलता है | खांसी में अनार के छिलके को मुँह में रखकर धीरे धीरे ३-४ बार चूसते रहने से लाभ मिलता है |

Thursday, 30 August 2012

आम का आध्यात्मिक व औषधीय महत्व - योगाचार्य विजय श्रीवास्तव






दुनिया भर में खाए व पाए जाने वाला फल "आम" जो फलों के राजा के रूप में जाना जाता है, हाँ अलग-अलग भाषाओँ में इसे अलग-अलग नामों से उच्चारित किया जता है, हिंदी में आम, आम्र, मराठी में आंबा, संस्कृत में कामबल्लभ, आम्र, गुजराती में अम्बो, बंगला में आम्र, अंग्रेजी में मैंगो तथा लैटिन में मैग्नीफेरा इंडिका आदि नामों से जाना जता है | अगर हम अध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो प्रत्येक पूजन व कलश स्थापना में आम की पत्ती का विशेष महत्व होता है, प्राकृतिक रूप से सूख कर गिरे आम की लकड़ी व पत्तियां हवन- यज्ञ कार्यों के लिए प्रयोग किये जाने पर उद्देश्य की पूर्ति में अतिउपयोगी सिद्ध होता है | औषधीय गुण व धर्म से कच्चा आम कषाय, अम्ल,वात एवं पित्त वर्धक और पका आम मधुर, स्निग्ध, बल तथा सुखदायक वात नाशक , शीतल, अग्नि, काफ और वीर्यवर्धक होता है | 
उज्जायी प्राणायाम

 आम के बौर शीतल रुचिकारक, अतिसार, वातकारक, प्रदर और रुधिर रोग नाशक है | आम का रस दूध के साथ लेना शक्ति व वीर्यवर्धक होता है | पके आम में विटामिन ए तथा सी प्रचुर मात्रा में पाया जता है | आम की गुठली का प्रयोग मुख रोग, कफ, वात तथा मधुमेह हेतु गुणकारी है | आम की गुठली का प्रयोग बाल झड़ना व रुसी में भी काफी लाभकारी है | आम के पत्तों को शहद में मिलाकर सेवन करने से हिचकी रोग शांत हो जाता है | छाया में सुखाये गए १० ग्राम आम के पत्ते का १/२ किग्रा जल में खौलाए हुए काढ़ा का सेवन मधुमेह में अपना चमत्कारी प्रभाव दीखता है | देशी आम का २५० ग्राम रस, ५० एम. एल. गोदुग्ध और ५ ग्राम अदरक रस व १० ग्राम मिश्री मिलाकर लस्सी कि तरह फेंट ले और २-३ सप्ताह तक सेवन करना आँखों और यकृत के लिए काफी उपयोगी है | शरीर के समस्त अवयवों को शक्ति प्रदान करने के लिए आम के १० पत्ते को १ ली. पानी में डालकर खौलाएं जिसमे कम से कम १½ ग्राम इलायची का  पाउडर पडा हो, ½ हो जाने पर स्वादानुसार दूध व शक्कर मिला कर चाय की तरह सेवन करना चाहिए | आम की गुठली को जल के साथ पत्थर पर पीस कर लगाने से भंवरा, बर्रे,मधुमक्खी, बिच्छू, या विषैले कीड़े- मकोड़े के दंश से उत्पन्न वेदना, विष,जलन तथा दाह को शांत करता है | आम तथा योग के अंतर्गत आने वाला उज्जायी प्राणायाम समस्त प्रकार के कंठ रोगों  के लिए अत्यंत लाभकारी है | आम के कच्चे फल के अत्यधिक सेवन से मन्दाग्नि, विषम ज्वर, रक्तदोष, मलबद्धता जैसे रोग उत्पन्न होते है | आम खाने के तुरंत बाद जल नही पीना चाहिए | इतने सारे गुणों के कारण ही तो आम फलों का राजा कहलाता है |

Tuesday, 14 August 2012

भारत माता की जय



यहाँ उपस्थित इस ब्लॉग के सभी पाठकों को मेरी ओर से हमारे प्यारे देश के ६६वें स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएं |
       आज इस अवसर पर देश पर मिटने वाले शहीदों की याद में कुछ पंक्तियाँ अपने उद्बोधन के रूप में रखना चाहता हूँ | यह तो सभी जानते हैं की १५ अगस्त भारत का स्वतन्त्रता दिवस है, आज़ादी हमें स्वत: नहीं मिल गई अपितु एक लम्बे संघर्ष और हजारों लाखों लोगों के बलिदान के पश्चात ही भारत आजाद हो पाया था |
     सन अट्ठारह सौ सत्तावन की प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम के  यज्ञ का आरम्भ किया महर्षि दयानंद सरस्वती ने और इस यज्ञ को पहली आहुति दी मंगल पाण्डेय ने | देखते ही देखते यह  यज्ञ चारों ओर फैल गया | झांसी की रानी लक्ष्मी बाई, तात्या टोपे, नाना राव जैसे योद्धाओं ने इस स्वतन्त्रता के यज्ञ में अपने रक्त की आहुति दी | दूसरे चरण में सरफरोशी की तमन्ना लिए रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु आदि देश के लिए शहीद हो गये | तिलक ने स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है का उदघोष किया, सुभाष चन्द्र बोस ने तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा का मंत्र दिया | अहिंसा और असहयोग का अस्त्र लेकर महात्मा गाँधी और गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ने को तत्पर लौह पुरुष सरदार पटेल ने अपने प्रयास तेज कर दिए | नब्बे वर्षों की लम्बी संघर्ष यात्रा के बाद पंद्रह अगस्त सन उन्नीस सौ सैंतालिस को भारत को स्वतन्त्रता देवी का आशीर्वाद मिल सका और हमारा देश गुलामी की बेड़ियों से मुक्त होकर स्वतंत्र हुआ | और इस आज़ादी को सुरक्षित रखना हमारा प्रथम कर्तव्य है | इस हेतु हम इस नारे के साथ इसकी रक्षा का संकल्प लेते हैं :-
                                                                
                                                                  प्यारा भारत , देश हमारा |
                                                                  इसकी रक्षा कौन करेगा???
                                                                हम करेंगे, हम करेंगे, हम करेंगे...

Saturday, 11 August 2012

हड्डियों के दर्द में रामबाण है "सुदर्शन का रस" - योगाचार्य विजय श्रीवास्तव







सुदर्शन एक ऐसा पौधा है जो लगभग अधिकतर उद्यानों व घरो में गमलों की शोभा बढ़ाते हैं इस वनौषधि को आमतौर पर सुन्दरता के लिए लगाते हैं लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि सुदर्शन के पत्तों में हड्डियों के दर्द को हरने की अद्भुत क्षमता है ये तमाम औषधीय गुणों से भी परिपूर्ण है | इस पौधे का रस हड्डियों के दर्द में चमत्कारिक प्रभाव दिखाता है | इसके पत्ते को आग पर गर्म करके दर्द वाले स्थान पर लपेटना काफी श्रेयष्कर है | यह पौधा घरों में फूल पत्ती लगाने के लिए बनायी गयी क्यारियों और पार्कों में बहुतायत दिखाई देती है, इसका फूल बड़ा, सुन्दर, सफ़ेद व सुगन्धित होता है | इसकी पत्तियों में वेदना हरने का अचूक गुण विद्यमान है , कहीं भी दर्द होने पर उस स्थान पर इसे पीस कर बाँध देने से जल्द ही पर्याप्त राहत मिल जाती है | सुदर्शन की पत्तियों का रस निकाल कर एक - एक बूँद कान में डालने पर तत्काल प्रभाव दिखाता है | हड्डियों के विकार व पीड़ा के लिए सुदर्शन की पत्ती से निर्मित लेप के प्रयोग के साथ साथ कुछ आसन व यौगिक क्रियाएं भी करनी चाहिए , जिसमें उत्कट आसन,  बद्धकोणआसन, त्रिकोणआसन, पद्मासना व कपालभाति इत्यादि का व्यवहारिक जीवन में प्रयोग काफी हितकारी सिद्ध होता है |
पहचान की दृष्टि से सुदर्शन का पौधा छोटा व लम्बी पत्ती वाला होता है इसमें सफ़ेद फूल निकलता है जो सुगन्धित होने के साथ ही सुंदर होता है , इसका आकर्षण देखने लायक होता है |

Thursday, 14 June 2012

पाचन तंत्र को पुष्ट करता है "पुदीना" व वज्रासन - योगाचार्य विजय

PUDINA
पूरे भारत वर्ष में पाया जाने वाला पौधा पुदीना किसी परिचय का मोहताज नही है | हाँ इतना जरुर है कि विभिन्न भाषाओं में यह भिन्न भिन्न नामों से जाना जाता है | हिंदी में इसे पुदीना और पोदीना, मराठी में पंदिना, बंगला में पुदीना, संस्कृत में पूतिहा, पुदिन:, गुजराती में फुदिनो, अंग्रेजी में स्पियर मिंट तथा लैटिन भाषा में मेंथा सैटाइवा व मेंथा विरिडस इत्यादि नामों से जाना जाता है|
               गुण धर्म व प्रयोग की दृष्टि से देखा जाये तो यह कफ वात शामक, वातानुमोलक, कृमिघ्न, हृदयोत्तेजक, दुर्गन्धनाशक, वेदना स्थापक, कफ नि:सारक है|
अरुचि, अपच, अतिसार, अफारा, श्वास, कास, ज्वर, मूत्ररोग इत्यादि में अति उत्तम माना गया है| वैसे तो पुदीना पूरे वर्ष पाया जाता है किन्तु इसका सर्वाधिक उपयोग गर्मियों में होता है| पुदीने में पाया जाने वाला एपटाइजर गुण उदर सम्बन्धी समस्याओं के लिए अमृत का काम करता है, जिससे पाचन तंत्र संतुलित रहता है| पुदीने के अन्दर पाए जाने वाले सुगंध मात्र से ही "लार ग्रंथि" (स्लाइवा ग्लैंड) सक्रिय हो जाता है जो पाचन क्रिया में अहम् भूमिका निभाता है| पुदीने का नित्य थोडा सा किसी न किसी रूप में सेवन तथा योगासन के अंतर्गत आने वाला वज्रासन पाचन तंत्र को सक्रिय रखने के लिए सर्वोत्तम है| यह याद रहे कि भोजनोपरांत दस मिनट तक वज्रासन में बैठने से पाचन क्रिया तीव्र व संतुलित रहती है| गर्मियों में चलने वाली लू (गर्म हवा) द्वारा शरीर पर पड़ने वाले दुष्प्रभावो को भी पुदीना मिश्रित "पना" नाकाम करता है| पुदीना का एक सबसे महत्वपूर्ण गुण यह भी है कि यह एसिडिटी के कारण उत्पन्न होने वाले पेट में जलन व सूजन को भी ठीक करता है| पुदीने की पत्ती को पीस कर माथे पर लेप करने से माईग्रेन के दर्द में भी राहत मिलती है| पुदीने के सेवन से श्व्वास की बदबू भी पूरी तरह से नियंत्रित हो जाती है| आमतौर पर उच्च रक्तचाप व निम्न रक्तचाप दोनों की दवा अलग - अलग होती है किन्तु पुदीना रक्तचाप की ऐसी औषधि है जो निम्न और उच्च दोनों ही रक्तचाप के लिए लाभकारी है| यह ध्यान रहे कि उच्चरक्तचाप के मरीज पुदीना सेवन में शक्कर व नमक का प्रयोग न करें| तथा निम्न रक्तचाप के मरीज को पुदीने में कालीमिर्च व सेंधा नमक मिला कर सेवन करना चाहिए|

Tuesday, 8 May 2012

कुलथ - पथरी रोग की अचूक दवा -योग व हर्बल विशेषज्ञ योगाचार्य विजय श्रीवास्तव










बीमारियों के परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो वर्तमान समय में तमाम बीमारियाँ समाज में दिखाई दे रही है, जिसमे सर्वाधिक रोगी मोटापा, सुगर, किडनी सम्बन्धी रोग तथा पथरी के पाए जाते है जिसके लिए कुलथी को सर्वोत्तम हर्बल के रूप में प्रयोग किया जाये तो यह अपना चमत्कारी प्रभाव दिखाते हुए अचूक सिद्ध होगा | कुलथी आम तौर पर बाजार में आसानी से उपलब्ध हो जाता है | यहाँ यह बताना आवश्यक है की इसे पूरे देश में भिन्न- भिन्न नामों से जाना जाता है, हिंदी में कुलथी, कुलथ, खरथी, गराहट | संस्कृत में कुलत्थिका, कुलत्थ | गुजराती में कुलथी | मराठी में डूलगा, कुलिथ तथा अंग्रेजी में हार्स ग्राम इत्यादि नामों से जाना जाता है | गुण धर्म की दृष्टि से यदि देखा जाये तो यह शोथहर, अश्मरी भेदन, कास, श्वास, वातशामक, पित्त नाशक, रक्त विकार नाशक, मेदा रोग, यकृत व प्लीहा रोग नाशक, मोटापा, शर्करा नाशक, गुर्दारोग व पथरी आदि में यह अति उपयोगी है | किडनी की पथरी का भेदन तथा मोटापा का शमन तीव्र गति से करता है | वैसे तो इसके सेवन की विभिन्न विधियाँ है किन्तु यदि सुविधा की दृष्टि से देखा जाये तो सबसे आसान तरीका यह है की लगभग २५ ग्राम कुलथी २५० ग्राम पानी में भिगाकर रात्रि में रख दे, सुबह शौचादि से निवृत्त होकर उस पानी को पी जाएँ | तत्पश्चात उस बचे हुए कुलथी में पुन: २५० ग्राम पानी डालकर रख दें फिर ५ से ६ घंटे बाद उसे खौलाएं, खौलने पर आधा हो जाने के बाद छान कर उसे पुन: पी जाएँ | इस प्रकार नित्य कुछ दिनों तक सेवन करने के उपरोक्त वर्णित समस्त रोगों में अत्यधिक लाभकारी सिद्ध होता है | अन्य चिकित्सा की दृष्टि से यदि देखा जाये तो चने का पानी उबाल कर पीना, पथरचट्टी की पत्ती का सेवन तथा यौगिक क्रिया में कपालभाति व बद्धकोणासन भी अचूक लाभकारी सिद्ध हुआ है | उपरोक्त के अलावा खीरा व खरबूजे का बीज, जौ व मूंग की दाल का पानी भी रोग से पीड़ित व्यक्ति को प्रयोग करना चाहिए | पथरी रोग से ग्रसित व्यक्ति को मद्यपान, मांसाहार, पालक, टमाटर, चावल व बैंगन का त्याग कर देना चाहिए |

Sunday, 6 May 2012

शरीर का पेसमेकर "थायराइड ग्रंथि" - योगाचार्य विजय श्रीवास्तव ("थायराइड का है योग में सफल इलाज ")

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थायराइड ग्रंथि मानव शरीर में गले में श्वास नाली के समीप पाई जाने वाली एक ऐसी ग्रंथि है जो थायाराक्सिन नामक हार्मोन का स्राव करती है, वही हार्मोन हमारे शरीर में होने वाली अधिकाधिक जैव रासायनिक क्रियाओं को नियंत्रित करता है | यह हार्मोन मानव शरीर में होने वाली लगभग सभी क्रियाओं को प्रभावित करता है | थायराक्सिन शरीर के वजन, नींद, उत्साह, भूख, प्यास, ऊर्जा इत्यादि को नियंत्रित व संतुलित करता है | जब थायराइड ग्रन्थि ठीक से कार्य नहीं करती है तो हमारे रक्त में थायराक्सिन नामक हार्मोन का स्तर ज्यादा या कम होने लगता है इसे हम दो श्रेणी में विभक्त करते है जैसे हाइपर थायराइडिज्म और हाइपोथायाराइडिज्म अर्थात हम कह सकते है शरीर में वजन का बढ़ना व घटना दोनों ही स्थिति में हमारे थायराइड ग्रन्थि का अस्वस्थ्य होना ही है इस महत्वपूर्ण हार्मोनल ग्रन्थि को स्वस्थ व संतुलित बनाये रखने के लिए उपचार की दृष्टि से कुछ हर्बल्स (वनौषधि) तथा यौगिक क्रियाओं का सहारा लेना आवश्यक है थायराइड को स्वस्थ रखने के लिए कचनार, पुनर्नवा, मुलेठी व दालचीनी का सेवन श्रेयष्कर है साथ ही साथ नियमित आसन व प्राणायाम जैसे मत्स्यासन, उष्ट्रासन, सर्वांगसन, आनंद्मदिरासन, उर्ध्वापद्मासन, सिंहासन, कपालभाति व उज्जायी प्राणायाम थायराइड ग्रन्थि में होने वाली सारी गतिविधियों को नियंत्रित रखते हुए सामान्य व स्वस्थ बनाए रखता है | इस ग्रन्थि का स्वस्थ रहना इसलिए आवश्यक है क्योकि यह ग्रन्थि शरीर का पेसमेकर अर्थात गतिनिर्धारक है |

Monday, 30 April 2012

करें कपाल भाति व अग्निसार क्रिया तथा पियें तुलसी का रस, नहीं लगेगी लू - योगाचार्य विजय श्रीवास्तव

आ गया गर्मी का दिन, गर्मी की शुरुआत और तापमान 40 -42° C यह कैसा पर्यावरण असंतुलन | अभी इतना तापमान तो आगे मध्य मई और जून में क्या होगा, लगता तो है मई - जून का तापमान चला जायेगा 50 - 52° C | तब लू चलेगी पराकाष्ठा पर | ऐसी स्थिति में लू से बचने के लिए क्या बेल का रस या आम का पना काम करेगा? ऐसा लगता तो नही | प्रचंड तापमान व लू से बचने के लिए प्रात: काल नित्य 10 मिनट कपाल भाति व ५ से ६ बार अग्निसार क्रिया  (यौगिक क्रिया) अवश्य करनी चाहिए, जो शरीर के तापमान को चौबीस घंटे के लिए मौसम व पर्यावरण के अनुकूल बना देता है, जाहिर है की जब हमारा शरीर आंतरिक व बाह्यरूप से मौसम के अनुकूल बन जायेगा तो हमारे ऊपर सनबर्न व लू का प्रकोप होगा ही नहीं | इसी प्रकार तुलसी की गर्मी हमारे शरीर की आतंरिक गर्मी को प्राकृतिक बाह्य तापमान से सामंजस्य बैठाता है | लू से बचने के लिए अगर नुस्खा अपनाना चाहते है तो याद रखें यदि धूप या लू की स्थिति में घर से निकलना हो तो चार चम्मच तुलसी के रस में एक चुटकी नमक मिलाकर पीने से लू लगने की आशंका नही रहती | लेकिन याद रहे यदि किसी को 'लू' लग गयी हो तो ऐसी स्थितिमे दो चम्मच तुलसी रस में देशी शक्कर मिलाकर दो-दो घंटे के अंतराल पर देते रहने से चौबीस घंटे के अन्दर पीड़ित व्यक्ति स्वस्थ्य हो जाता है|